अभिनेता, नाटककार, लेखक गिरीश कर्नाड का निधन, फ़िल्म जगत में शोक की लहर

By   Gagandeep
10 Jun 2019 @ 23:02

भारतीय सिनेमा के जाने-माने अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक, नाटककार, लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता गिरीश कर्नाड का लंबी बीमारी के बाद सोमवार की सुबह बेंगलुरु स्थित अपने आवास पर निधन हो गया. बताया जा रहा है कि उनके न‍िधन की वजह मल्टीपल ऑर्गेन का फेल होना है. पिछले कुछ महीनों से उनका इलाज चल रहा था. कर्नाड के निधन से साहित्य और सिनेमा जगत में शोक की लहर है.

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के हिल स्टेशन माथेरान में 19 मई 1938 को जन्मे गिरीश रघुनाथ कारनाड बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.कारनाड महाराष्ट्र के कोंकणी भाषी परिवार में पैदा हुए. उनकी शुरुआती पढ़ाई मराठी में हुई, जब उनका परिवार धारवाड़ में चला गया तो वे कन्नड़ में पढ़ने लगे.आगे उनका सारा जीवन कन्नड़ भाषा के लिए योगदान करते हुए कर्नाटक में बीता. गिरीश अंग्रेजी और मराठी के बड़े जानकार थे पर लेखक के तौर पर उन्होंने कन्नड़ भाषा को चुना. उन्होंने अंग्रेजी के कई प्रतिष्ठित नाटकों का अनुवाद भी किया. 1960 के दशक में नाटकों के लेखन से कर्नाड को लोग पहचानने लगे. हिंदी फिल्मों के अलावा गिरीश कर्नाड ने कन्नड़, तमिल, तेलुगू और मलयालम फिल्मों में भी काम किया. हिंदी फिल्म टाइगर जिंदा है में गिरीश आखिरी बार सलमान के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए नजर आए थे.

आर के नारायण की किताब पर आधारित टीवी सीरियल मालगुड़ी डेज़ में उन्होंने स्वामी के पिता की भूमिका निभाई जिसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था और यह आज भी उतनी ही मशहूर है.15 जून को दिल्ली के श्रीराम सेंटर में उनके द्वारा लिखित नाटक ‘अग्नि और बरखा’ का मंचन होना है. श्रीराम सेंटर में ही 8 जून को हुआ था नाटक तुगलक का मंचन.

गिरीश के प्रमुख नाटक ययाति , तुगलक , हयवदना , अग्नि बरखा, नागमंडला , रक्त कल्याण, बिखरे बिम्ब, वेडिंग एल्बम. तलेदंड ( हिंदी में रक्त कल्याण), द ड्रीम्स ऑफ टीपू सुल्तान, ओडाकालू बिमंबा, द फायर एंड द रेन थे और प्रमुख फिल्में संस्कार, निशांत , मंथन , स्वामी, गोधुलि , भूमिका , उत्सव, सुरसंगम, नागमंडला , एक था टाइगर , टाइगर जिंदा है थीं. गिरीश को 1992 में पद्म भूषण, 1974 में पद्मश्री,1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1998 में उन्हें कालिदास सम्मान मिला था. 1978 में आई फिल्म ‘भूमिका’ के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था. उन्हें 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया.

गिरीश कर्नाड के निधन पर फ़िल्म, राजनीति और अन्य वर्गों के लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

 

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